मप्र 10 महीने में आठवें से प्रथम स्थान पर आया

अपना लक्ष्य


भोपाल प्रदेशवार ग्रामीण पेयजल गुणवत्ता की निगरानी की रैंकिंग में मात्र 10 माह में मध्यप्रदेश देश में आठवें स्थान से प्रथम स्थान पर आ गया है। इस उपलब्धि में जिला एवं तहसील लैब की 70 फीसदी और स्टेट लैब की 30 फीसदी हिस्सेदारी बताई जा रही है। वहीं, स्टेट और जिला लैब की रैंकिंग में प्रदेश दूसरे नंबर पर है। इसे प्रदेश से तहसील स्तर तक पिछले दस माह में किए गए सुधारों का परिणाम माना जा रहा है। स्टेट रैंकिंग में ओडिशा और जिला रैकिंग में आंध्रप्रदेश ने देश में पहला स्थान पाया है। 25 नवंबर की रैंकिंग के आधार पर प्रमुख सचिव लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी संजय शुक्ला ने यह जानकारी दी है। प्रमुख सचिव शुक्ला ने पत्रकारों को बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की शुद्धता की निगरानी के लिए 10 माह पहले काम शुरू किया था, जिसके सुखद परिणाम सामने आने लगे हैं। उन्होंने बताया कि सीमित संसाधनों में ही यह परिणाम हासिल किया गया है। शुक्ला ने बताया कि देश में अच्छा काम करने वाली लैबोरेटरी की टॉपटेन सूची में मध्य प्रदेश की पांच जिला लैब के नाम शामिल हो गए हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश में विभाग की 155 लैब हैं। जिनमें पेयजल की शुद्धता का परीक्षण किया जाता है। शुक्ला ने कहा कि प्रदेश में राइट टू वॉटर की सुगबुगाहट शुरू होने से पहले ही लैबों के कामकाज में सुधार की जरूरत महसूस होने लगी थी। शुक्ला ने बताया कि आम आदमी भी तय शुल्क देकर इन लैब से पानी की शुद्धता का परीक्षण करा सकता है। यदि उनका पानी अशुद्ध पाया जाता है, तो उसे बदलने या उसकी शुद्धता के उपाय बताए जाते हैं। उन्होंने कहा कि लैब लोगों की पहुंच में हों इसलिए उन्हें जल्द ही जीआई मैप पर ला रहे हैं। स्थिति में सुधार के लिए विभाग ने जिला और तहसील लैबों की परीक्षण क्षमता दो सौ से बढ़ाकर 300 सेंपल हर माह चैक करने की कर दी। वहीं बच्चों को प्रतियोगिता के माध्यम से पानी की महत्ता और विभाग के प्रयासों की जानकारी दी गई। लैबोरेटरी ठीक से काम कर रही हैं, इसे जानने के लिए रैंकिंग तैयार की गई है, जो कितने परीक्षण किए, वेबसाइट पर एंट्री की या नहीं, लैब में कितने स्टूमेंट हैं, चालू हालत में हैं या नहीं, वार्षिक मेंटेनेंस का काम किसी को सौंपा है या नहीं, जनता को जानकारी देते हैं या नहीं, जैसे मापदंडों से रैंकिंग तैयार होती है