मप्र भाजपा चुनाव की उलझती गुत्थी चुनाव लड़ सकता है शिवराज कैंप...

 


न काहू से बैर


भोपाल । प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। कांग्रेस में कमलनाथ की जगह नए अध्यक्ष का मामला निर्वाचन की बजाए हाईकमान की मेहरबानी पर निर्भर है। वहां लोकतंत्र के मामले में खुला खेल फरुख्खावादी है। न खाता न बही, जो हाईकमान कहे वही सही। भाजपा में उलट मामला है। यहां मंडल से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक बूथ कार्यकर्ताओं के वोट पर निर्भर है। क्या करें पार्टी का संविधान ही ऐसा है। मगर अब पार्टी संविधान के इतर भी भाजपा में बूथ कार्यकर्ता के वोट से इलेक्शन नहीं बल्कि उसकी राय से सिलेक्शन होगा। ये जो राय है यहीं से पेंचबाजी शुरू होती है। असल में बूथ कार्यकर्ता के वोट से मंडल अध्यक्ष समेत 61 प्रतिनिधियों के चुनाव होते हैं। मगर इस बार थोड़ा बदलाव हुआ है और रायशुमारी पर पूरा चुनाव टिका हुआ है। मतलब वोट नहीं राय किसकी क्या होगी इसी में गड़बड़झाला है। ऐसे माहौल में पार्टी में हाशिए पर धकेली जा रही टीम शिवराज का भविष्य सवालों के घेरे में है। जीवन मरण की स्थिति में कैंप शिवराज की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष के लिए कोई उम्मीदवार मैदान में उतर सकता है। जानकारों को याद होगा स्वयं शिवराज सिंह चौहान एक बार संगठन के प्रत्याशी विक्रम वर्मा के खिलाफ अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि तब चुनाव वर्मा जीत गए थे। इस बार चुनाव हुए तो हालात कश्मकश पूर्ण हो सकते हैं।  पूरा मामला चुनाव कराने वालों की मर्जी और मेहरबानी पर ज्यादा है। एक तरह से इस बार संविधान को ठेंगा बताया जा रहा है।
प्रदेश भाजपा संगठऩ पहले से बहुत कमजोर स्थिति में है। एक जमाने में संगठन की शक्ति क्षेत्रीय और बाद में संभागीय संगठन मंत्रियों के इर्दगिर्द घूमती थी। अब हालात के साथ चाल चरित्र और चेहरे बदल गए हैं । कल तक जिस शिवराज सिंह चौहान पर संगठन पूरे तौर पर आश्रित था अब वही संगठन उन्हें साईड लाईन करने के तौर तरीके ढ़ूढ़ रहा है। राफेल फायटर प्लेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को जिस तरह राहुल गांधी के खिलाफ मुद्दा बनाकर पार्टी जनता के बीच गई उसमें शिवराज सिंह की गैरहाजिरी चर्चा का विषय थी। असल में यहीं से शिवराज कैंप  को  पिछले “न काहू से बैर” में हाशिए पर लाने की जो आशंकाएं जताई थी वे सही होती दिख रही हैं। इसके साथ चौकस हुए शिवराज और उनके समर्थक नई रणनीति बनाने पर काम कर रहे हैं। सबको पता है विधानसभा चुनाव हारने के बाद हाईकमान ने शिवराज सिंह को केन्द्र की राजनीति में आने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने विनम्रता पूर्वक इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि अभी तो जीना यहां मरना यहां। उनके समर्थक भी कहते हैं प्रदेश को अभी मामा की जरूरत है। लेकिन हर कोई जानता है हाईकमान को पसंद नहीं है। वैसे भी शिवराज जब मुख्यमंत्री थे तब भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बाडीलैंग्वेज यह बताती थी कि सबकुछ सामान्य नहीं है। 
बहरहाल मध्यप्रदेश में भाजपा में कोई भी नेता शिवराज को टक्कर देने लायक कद काठी नहीं बना पाया है। आज भी जनता और मीडिया में अन्य नेताओं के साथ शिवराज हों तो उन्हें ही ज्यादा तरजीह मिलती है। इसके अलावा जो भी नेता प्रदेश अध्यक्ष या मुख्यमंत्री की दौड़ में आता है उसके खिलाफ घोटाले और गड़बड़ियों की फाईल खुल जाती है। कैलाश विजयवर्गीय का पेंशन घोटाला और नरोत्तम मिश्रा को लेकर ई टेंडर घोटाले की जांच की फाईलें सबको पता है। इसके अलावा संगठन के मामले में भी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह से लेकर संगठऩ मंत्रियों का कार्यकर्ताओं से जितना परिचय है अकेले शिवराज इनसे ज्यादा कार्यकर्ता और पदाधिकारियों को जानते हैं। चुनाव होने की स्थिति में कार्यकर्ताओं से नजदीकी संबंध जिन नेताओं के होंगे सफलता उसे ज्यादा मिलेगी। एक जमाना था जब संगठन मंत्री के इशारे पर कार्यकर्ता काम करते थे। मामला चाहे संगठऩ चुनाव का हो या आम चुनाव का। मगर यह सब बीते दिनों की बात है। जैसे नर्मदाजी में पानी बहुत बह गया है और रेत अरबों टन निकल चुकी है ऐसे ही संगठऩ और उनके संगठन मंत्रियों के प्रति मान सम्मान और निष्ठा का ग्राफ काफी नीचे चला गया है।
कार्यकर्ता पहले से ही मंडल अध्यक्ष के लिए 40 तक की उम्र के बोए गए नए कांटों से लहुलुहान हैं। असंतोष का आलम ये है कि अनुभव में पके कार्यकर्ता अध्यक्ष बनने के पहले ही पके हुए फलों की तरह संगठऩ से नीचे गिर रहे हैं। महिला प्रतिनिधियों का लोचा भी आने वाले वक्त में असंतोष और सियासत का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
चुनाव प्रक्रिया में प्रदेश प्रतिनिधि को 230 विधानसभा सीटों के अनुसार चुना जाएगा। इनमें यदि महिलाएं नहीं चुनी गई हैं तो इनका नामांकन अलग से किया जाएगा। कुल प्रतिनिधियों की संख्या करीब 250 होगी। इस तरह सब कुछ ठीक रहा तो नवंबर के अंत या दिसम्बर के पहले सप्ताह तक प्रदेश भाजपा में अध्यक्ष का निर्वाचन हो जाएगा। असंतोष या विवाद के चलते इसे स्थगित कर राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद भी संपन्न कराया जा सकता है।  


ए उम्र अगर दम है तो....
   प्रदेश भाजपा के एक प्रवक्ता की उम्र के प्रतिबंध को लेकर सोशल मीडिया पर आई टिप्पणी पार्टी की अंदरूनी खेंच पेंच पर रोशनी डालती है। “ – ए उम्र अगर दम है तो कर दे इतनी सी खता। मंडल तो छीन लिया,जिला छीन के बता ”। 47 वर्ष का मंडल अध्यक्ष की दौड़ से बाहर हुआ एक नेता। ये पंक्तियां पार्टी संविधान पर भारी पड़ रही अलिखित नियमों के खिलाफ एक तरह से दुख लाचारी और नाराजगी सबकुछ बयां करती है। वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं यह संगठन पर कब्जा करने और पार्टी के लिए अपनी जवानी दांव पर लगाने वालों के साथ धोखाधड़ी है। इस बारे में जब चुनाव अधिकारी हेमंत खंडेलवाल से बात हुई तो उन्होंने कहा कि सब कुछ नियम से हो रहा है। थोड़े बहुत अधिकार निर्वाचन अधिकारियों को दिए गए हैं। भाजपा संविधान के मुताबिक बूथ कार्यकर्ताओं के वोट से  मंडल के 61 सदस्यों समेत मंडल अध्यक्ष व जिले के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। मगर इस बार रायशुमारी के नाम पर वोट से चुनाव की प्रक्रिया टाल कर लिफाफे में बंद रायशुमारी के स्थान पर मनोनयन होगा। यहीं से चालीस पार हुए अनुभवी कार्यकर्ताओं को संगठऩ से बाहर का रास्ता दिखाने का काम शुरू हो गया। नौजवानों के नाम पर अनुभव को एक तरह से कूड़ेदान में डाल दिया जाएगा।