पदोन्नति का मुद्दा सरकार के लिए बना बर्र का छत्ता

अपना लक्ष्य


भोपाल प्रदेश के कर्मचारियों की पदोन्नति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भले ही सरकार की दलील खारिज कर स्पष्ट आदेश दे चुकी है। पदोन्नति के मामले में आरक्षण जरूरी नहीं है। फिर भी यह मामला 2016 से जस का तस लटका हुआ है। पहले दो साल शिवराज सरकार और एक साल की कमलनाथ सरकार इस मुद्दे का समाधान नहीं कर पा रही है। अजाक्स और सपाक्स के तेवरों को देखते हुए यह मुद्दा राममंदिर जैसा पेचीदा हो गया है। सरकार अपने निर्णय पर कायम रहती है, तो एक पक्ष नाराज होगा और हटती है तो दूसरा। पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा बर्र का ऐसा छत्ता बन गया है, जिसे कोई छेडना नहीं चाहता है। जबकि जबकि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले को लेकर सरकार पेशी बढ़वाने के नाम पर ही करीब छह करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। अभी और कितना पैसा फूंका जाएगा, यह भी तय नहीं है। सूत्रों के अनुसार पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने के विरोध में जबलपुर हाईकोर्ट में लगी याचिकाओं में सुनवाई के दौरान देश के ख्यातिनाम अधिवक्ता कपिल सिबल पैरवी करेंगे। वे एक पेशी के 35 लाख रुपए और आने जाने पर मिलाकर लगभग चालीस लाख रुपए खर्च होंगे। राज्य के महाधिवता शशांक शेखर ने कपिल सिबल को सरकार का पक्ष रखने के लिए अधिवक्ता नियुक्त करने का प्रस्ताव भेजा था। उधर सुप्रीम कोर्ट में भी आगामी पेशी में प्रदेश सरकार कर्मचारियों को सशर्त पदोन्नति देने की अर्जी दाखिल करने की तैयारी कर रही है।


अप्रैल 2016 में पदोन्नति से आरक्षण पर रोक


अप्रैल 2016 में मप्र हाईकोर्ट ने प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगाने आदेश दिया था। इसके विरोध में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट में मामले की डबल बेंच सुनवाई कर रही थी। इसमें एम नागराज बनाम भारत संघ प्रकरण को आधार बनाकर सुनवाई की जा रही थी। इसी बीच एम नागराज प्रकरण को चुनौती दी गई। जिससेडबल बेंच ने इस मामले को पांच सदस्यीय खंडपीठ में भेज दिया। जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने पिछले साल 26 सितंबर के निर्णय में कहा कि पदोन्नति में आरक्षण दिया जाना संवैधानिक बाध्यता नहीं है। राज्य चाहे तो आरक्षण दे सकता है। पीठ के इस फैसले के बाद एक बार फिर से मामला सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच में चला गया। जिसमें मप्र हाईकोर्ट के दिए निर्णय को लेकर सुनवाई की जा रही है। इसी के बाद स्पष्ट हो सकेगा कि मप्र में पदोन्नति में आरक्षण दिया जाएगा या नहीं। सरकार ने निर्णय लेने के स्थान पर कोर्ट के निर्णय का सहारा लेकर मामले को लटकाये रखा है। इसी बीच हजारों अधिकारी, कर्मचारी बिना परोन्नति सेवा हो गए।


जस्टिस बोबड़े देंगे नई तारीख


इस मामले को लेकर बीते 15 अक्टूबर को पेशी थी। लेकिन यह तिथि आगे बढ़ गई। अब नए सीजेआई जस्टिस अरविंद बोबड़े सुप्रीम कोर्ट में पेशी की अगली तिथि तय करेंगे। जिसमें सरकार 2003 के नियम अनुसार सशर्त पदोन्नति देने का आवेदन दे सकती है।


बिना पदोन्नति के हजारों कर्मचारी सेवानिवत्त


विगत तीन वर्षों से अधिक समय से प्रदेश के सभी विभागों में पदोन्नतियां बाधित हैं। हजारों शासकीय सेवक बिना पदोन्नति का लाभ प्राप्त किए सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वरिष्ठ खाली पदों पर शासन प्रभार से कार्य करा रहा है। आगामी वर्ष अप्रैल से एक बार फिर कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति का सिलसिला शुरू हो जाएगा। सरकार का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में सशर्त पदोन्नति की अर्जी दाखिल करने के बाद राहत मिलती है, तो इसी पर काम किया जाएगा, सरकार सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर इस मामले को लंबित रखा चाहती है।