शिक्षा में हो संस्कार व शाकाहार का संदेशः आचार्यश्री आर्जव सागर

 श्रद्धा भक्ति संयम में लीन है एवं प्रतिदिन आचार्य श्री के मुखारविंद से ज्ञान की गंगा बह रही है


अपना लक्ष्य


भोपाल परम् पूज्य वात्सल्य मूर्ति धर्म प्रभवक आचार्य श्री 108 आर्जव सागर जी महाराज के सासंघसानिध्य अशोका गार्डन में चल रहे चतुर्मास में कई श्रद्धाल श्रद्धा भक्ति संयम में लीन है एवं प्रतिदिन आचार्य श्री के मुखारविंद से ज्ञान की गंगा बह रही है जिसमें आस-पास के श्रद्धालु प्रतिदिन धर्म लाभले रहे हैं आज अष्टमी के दिन पर विशेष रूप से चारों तरफ से चार चांदी के कलशों से भगवान का पुजारीयों द्वारा मंत्रउच्चारण के साथ जगत एवं विश्व में शांति कामना हेतु जलाभीषेक किया गया एवं जलाभीषेक के पश्चात पुजारियों ने पूजा अर्चना भक्ति नृत्य के साथ की गई एवं जिसके साथ भगवान के गुणों कि वंदना भी की गई। आचार्य श्री ने पूरी समाज को यही संदेश कि एक अण्डे के अध्ययन से पता चलता है कि एक अण्डे में 15000 छिद्र होते हैं जिससे वह श्वांस लेता है। अतः यह सिद्ध हो गया कि अण्डे में भी जीव है। सौंदर्य प्रसाधन में भी गाय की चर्बी व असंख्य प्राणियों के रक्त व मज्जा का प्रयोग किया जाता है अतः ऐसी वस्तुओं का तुरंत त्याग करना चाहिए जिससे कि मूक जीवों की रक्षा हो सके और हमारा देश सर्वत्र अहिंसा मय बन सके। आज आचार्य श्री जी ने आशीष वचनों में कहा कि माता पिता के बाद शिक्षक ही बच्चों को सही ज्ञान व संस्कार दे सकता है।बच्चों में सही ज्ञान का विकास ही उसके भविष्य निर्माण में सहायक होता है। हमारी भारतीय संस्कृति ही ऐसी है जहाँ पर ज्ञान तप अहिंसा धर्म व दया का पाठ पढ़ाया जाता है। आचार्य गूरूवर जी ने आगे बताते हुए कहा अहिंसा के बल पर महात्मा गांधी जी ने इस देश को स्वतंत्रता दिलायी थी हमारे धर्म में भी दया धर्म को मूल कहा गया है। जियो और जीने दो की मान्यता का संदेश पूरे विश्व में शांति का पाठ पढा रहा है। बच्चों को शिक्षा में संस्कार के साथ शाकाहार का भी पाठ पढ़ाए। आशीष वचन में विराम देते हुए कहा कि शुद्ध शाकाहार से मन व चित्त शांत प्रसन्न रहता है और स्वस्थता प्रदान करता है। मांसाहार से मूक प्राणियों का वध हो रहा है तथा तरह-तरह की बीमारीयां फैल रही है। अतः सभी को मांसाहार रोकने के प्रति जागरूक होना चाहिए।